दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा, जिसे शारदीय नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है, भारत में सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक है, विशेषकर भारत के पूर्वी राज्यों जैसे - असम, बिहार पश्चिम बंगाल व पूर्वी उत्तर-प्रदेश, में। यह भव्य त्योहार, जो आम तौर पर सितंबर या अक्टूबर में होता है, दिव्य नारी स्वररूप की उपासना को समर्पित है।

वस्तुतः दुर्गा पूजा में भगवती पराम्बा के 9 रूपों की आराधना 9 दिनों में की जाती है। दुर्गा पूजा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है जो सीमाओं और मतभेदों को पार करते हुए जीवन के सभी क्षेत्रों के लोगों को एकजुट करता है।

माँ दुर्गा के नौ रूप है - माता शैलपुत्री, माता ब्रह्मचारिणी, माता चंद्रघंटा, माता कुष्मांडा, माता स्कंदमाता, माता कात्यायनी, माता कालरात्रि, माता महागौरी, माता सिद्धिदात्री पूजा।

दुर्गा पूजा समारोह

मूर्ति की तैयारी: दुर्गा पूजा की तैयारी महीनों पहले से शुरू हो जाती है। कुशल कारीगरों द्वारा देवी दुर्गा की मूर्तियाँ बनायी जाती है। ये मूर्तियाँ आमतौर पर मिट्टी से बनी होती हैं और रंगों व आभूषणों से सजाई जाती हैं।

पंडाल और सजावट: मूर्तियों को रखने के लिए अस्थायी संरचनाएँ बनाई जाती हैं जिन्हें "पंडाल" कहा जाता है। इन पंडालों को भव्य रूप से सजाया जाता है, अक्सर किसी विशिष्ट थीम पर, जो साल-दर-साल अलग-अलग होते हैं। विस्तृत प्रकाश व्यवस्था, कलाकृति और फूलों की सजावट पंडालों को सुशोभित करती है, जिससे एक मनोरम और डूबे हुए वातावरण का निर्माण होता है।
समाज के सभी वर्गों के लोग देवी के प्रति सम्मान व्यक्त करने और कलात्मक अभिव्यक्तियों की प्रशंसा करने के लिए खूबसूरती से सजाए गए पंडालों में जाते हैं।

अनुष्ठान: त्योहार की शुरुआत मूर्तियों की स्थापना के साथ होती है, जिसके बाद विभिन्न अनुष्ठान होते हैं। भक्तगण देवी माँ का आशीर्वाद पाने के लिए उपवास करते हैं और प्रार्थना करते हैं।

विसर्जन: विसर्जन का अर्थ जल में विलीन होना होता है। विसर्जन के दौरान माँ भगवती को सम्मान पूर्वक उन्हे उनके धाम जाने का आग्रह और अगले साल वापस आने के लिए आमंत्रित करते हैं।