उत्तर प्रदेश की विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उर्दू को लेकर ‘कठमुल्ला’ बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है। पांडेय ने अंग्रेज़ी को विधानसभा की भाषा के रूप शामिल करने का विरोध किया। इसी के आगे वे सुझाते हैं की आगर आप चाहते हैं तो संस्कृत या उर्दू को शामिल किया जा सकता है।मुख्यमंत्री के ‘उर्दू-विरोधी’ रवैये पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि क्या उर्दू के शायर फिराक गोरखपुरी और मुंशी प्रेमचंद कठमुल्ला थे?
माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि हमारी कार्यसंचालन नियमावली में 82 में संशोधन की बात रखी गई है। उसमें 282 के अंतर्गत हमारी विधानसभा की भाषा हिंदी और देवनागरी लिपि रखा गया था। यह बड़े संघर्षों के बाद आजादी के बाद ये दिन आया था कि हम अपनी देवनागरी लिपि और हिंदी भाषा में बात रख सकते थे। आज उसमें संशोधन किया जा रहा है। मैं संशोधन के विरोध में नहीं हूं। हम कल भी बात किए थे और आज फिर बात कर रहे हैं। हमारी जो स्थानीय बोली है, उसको आप रखें। हमारे संविधान में भी है कि जिस भाषा में बोल सकें बोलें लेकिन अंग्रेजी हमारी भाषा नहीं है। अंग्रेजी न तो हमारी मातृभाषा है। न हमारी सांस्कृतिक भाषा है। उसको हमने इसमें रखने का ऐतराज किया था।
मुख्यमंत्री जी संस्कृत सुने नहीं और उर्दू पर बड़ा गंभीर आरोप लगा दिए। ये भी कहा गया था कि ये कठमुल्ला पैदा करते हैं। हम आपके माध्यम से जानना चाहते हैं कि गोरखपुर में एक बहुत बड़े उर्दू के जानकार और उर्दू के कवि रहे हैं रघुवीर सहाय, फ़िरक… क्या वो कठमुल्ला थे। क्या मुंशी प्रेमचंद गोरखपुर के स्कूल में अध्यापक थे, उन्होंने उर्दू में उपन्यास लिखे क्या वो कठमुल्ला थे। क्या विश्वविद्यालयों में जो उर्दू विभाग खोला गया है क्या उसके स्टूडेंट कठमुल्ला हैं। क्या अरबी फारसी विश्वविद्यालय बना है, उसके पढ़ने वाले कठमुल्ला हैं।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जी उर्दू से चिढ़ जाते हैं। मैं आपसे ये कहना चाहता हूं कि आप अंग्रेजी को न जोड़िए। अगर आप जोड़ना चाहते हैं तो संस्कृत को जोड़ दीजिए। संस्कृत से सभी भाषाओं का उद्भव हुआ है। या उर्दू जोड़ दीजिए। हालांकि, उर्दू पर मुख्यमंत्री जी नाराज हो जाते हैं। इनका अपना एजेंडा है, आप चलाएं।